Thursday, October 12, 2023

Bhagvad Gita in Brief

 https://www.blogger.com/blog/post/edit/3729731558147000441/2044075230376321986

Wednesday, June 21, 2023

India valued the most important: Highest Point in my Career in Foreign Service:

 While covering the visit of the Indian delegation led by Prime Minister Modi to USA right from Washington, I feel the most proud of having served India as IFS officer.  India today has gained the highest place in the family of nations. With Modi leading India 's policies, we are recognised  as  an apostle of peace throughout the world.  India is valued equally important for most of the countries in the world, be it USA, Russia, Ukraine, Australia, Gulf countries or Pacific Islands.  Today we are not only leading in the Yoga skills, but also attracting  manufacturers of leading companies of the world's most powerful countries. 





Monday, March 13, 2023

Karmyog, gyanyog, bhaktiyog k mahatwa

  मनुक्खक जीवनमे कर्म योग, ज्ञान योग एवं भक्ति योगक महत्व
                        
भगवत् गीतामे भगवान श्रीकृष्ण सर्वप्रथम कर्म योग, ज्ञान योग एवं भक्ति योग के विषय मे प्रकाश देने छथिन्ह।अर्जुन पृथ्वी परक सभ मनुक्ख जकाॅं मोह, माया मे उलझिकॅं किंकर्त्तव्यविमूढ़ भेल, कर्तव्य सॅं विमुख भ' क' भगवानक शरण मे छथि। भगवान ओकरा आत्मा परमात्मा के अर्थ, भेद एवं योग के विषय बुझबैत कर्म योग, ज्ञान योग एवं भक्ति योग के मार्गसॅं पृथ्वी पर सतत् पतनशील धर्म व्यवस्थाकेॅं पुनः स्थापनाक लेल अन्याय के विरुद्ध युद्ध करय लेल तैयार करैत छथिन्ह। ई संदेश अर्जुन मात्र के लेल नहि बल्कि पूर्ण मनुक्ख समुदाय लेल छैक।
               मनुक्खक सभ कर्म इच्छा सॅं प्रेरित छैक, अर्थात फल प्राप्तिक इच्छासॅं। एहि तरहक कामनासॅं प्रेरित कार्यकेॅं सकाम कर्म कहल जाइत छैक। उदाहरण स्वरूप जीवन यापन के व्यवस्था केनाई, आवास, स्वास्थ्य आदि के व्यवस्था, यश, सन्तान प्राप्ति, धन प्राप्ति, ग्रह, व्याधि शान्ति आदि। वेद वा पुराणमे वर्णित विधिपूर्वक कएल जाय त' ओ सकाम कर्म कहल जाइत छैक, आ ओकर फल पूजित देवता, पितर दैत छथिन्ह।सकाम कर्म द्वारा मनुक्ख एहि जीवन के सुख सम्पदाकेॅं भोगिकऽ जीवन मृत्यु के नियमित चक्र के पार करैत अछि।जाहि मे जन्म , बिमारी, बुढापा, मृत्युकेॅं अवश्यंभावी कष्ट के कर्मानुसार भोगय परैत छैक। एहि चक्रकेॅं कर्मानुसार मृत्यु पश्चात स्वर्ग, नर्क व मृत्युलोक जाहिमे अनिश्चिते रुपसॅं पुनर्जन्म भोगय परैत छैक।
               मानव जीवनमे सफलताक बहुत महत्व छैक। सफल जीवनक कामना सभ करैत अछि। एहि लेल सभ लोक विशेष तैयारी, उचित सामग्री, समय, मेहनति लगाक' प्रयास करैत अछि। सफलता प्राप्तिक पश्चात अहंकारक बोध सेहो होइत छैक। एहन अवस्थामे लोक निष्काम कर्म के चर्चा केनाई, फलत्यागक विषयमे सोचनाई, कर्मफल त्याग व सन्यासक बारेमे जाननाई अनर्गल बुझैत छैक।आ ई लोकप्रिय विषय नहि अछि। तथापि निष्काम कर्म के ल' क' भगवान कृष्णकेॅं मानवक कल्याण हेतु मूलभूत उपदेश छनि -
" कर्मण्येवाधिकारस्ते,मा फलेषु कदाचन्
या कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते संगोत्स्वकर्मणि"
Your right is to your work,never to the fruits. Be neither motivated by the fruits of your work, Nor be inclined to give up.
एहि श्लोकमे कर्मफलसॅं आसक्तिके त्यागक लेल उपदेश छैक।
               मनुक्ख कर्मसॅं कखनो विमुख नहि भऽ सकैत अछि। अकर्मण्य व्यक्ति अपन जीवन यापन सेहो नहि कऽ सकैत अछि। किओ अपना हाथ पैर या अन्य कर्मेंद्रिय के एको क्षण लेल रोकि क' नहि राखि सकैत अछि। शरीरक बनावटे एहि तरहक छैक। जीवन चक्र एहन छैक कि काज(कर्म) हेतैक त' कर्मफल निश्चिते हेतैक। ई कर्मफल तऽ कर्त्ता के भेटतैक। परन्तु एहि श्लोकमे कर्मफलकेॅं त्यागक अर्थ छैक जे मनुक्ख अपना कर्ता भावकेॅं त्यागि दैथ। कर्त्ता भावकेॅं त्याग मात्रसॅं अहंकार भाव के त्याग होइत छैक। अहंकार भावक कारणे लोक बजैत छैक कि ई हमर अछि, ई हम केलहुॅं, हमही एकर मालिक छी, हमर बात सुनू वा हमर बात मानू। एहि अहंकारवश मनोनुकूल फल प्राप्ति के नहि भेलासॅं दु:ख व अफसोस होइत छैक। मनोनुकूल फल प्राप्तिक इच्छा के चिंता होइत छैक। ओहि वस्तु के प्रति मोह उत्पन्न होइत छैक। मोहित वस्तु के प्राप्तिमे बाधा भेलासॅं क्रोध उतपन्न होइत छैक, क्रोधसॅं विवेक नाश होइत छैक व सर्वनाशक आरंभ भ' जाइत छैक।
               जॅं कर्मफलके मानसिक रुपसॅं त्यागि दैत छियैक यानी हम ई कहलहुॅं, ई हमर अछि ,एहि भावके त्यागि क' ईश्वर पर समर्पण करैत छी अर्थात सब किछु ईश्वर के कएल छनि वएह कर्त्ता छथि आ वएह कर्मफल के अधिकारी छथि त' प्रत्येक कर्म ईश्वर के समर्पित भ' जाइत छैक। जेना एहि श्लोक मे हमरालोकनि पढैत छी - " त्वदीयं अस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितं। गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।" 
       भक्तिक विधि भगवान अर्जुन के एहि श्लोकमे सिखबैत छथिन्ह कि भक्ति कोना कएल जाय जाहिसॅं ओ निष्काम कर्मयोग के श्रेणीमे आबि सकय।
" यज्जुहोषि, यदस्नासि,यत करोषि,ददासि यत, यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदार्पणम।"
जे कोनो शुद्धि, पूजा पाठ, यज्ञ करैत छी, जे कोनो काज करैत छी, जे किछु(दानमे) दैत छियैक, जे कोनो तप, व्रत करैत छी या सहैत छी ताहि सभके हमरा(ईश्वर के प्रति) समर्पण करु।
" Whatever you do,  whatever you pray, whatever you offer in sacrifice, whatever you give and whatever vow you keep, do everything as an offering to me"
अहंकार भावसॅं रहित भेला पर कर्मफलके प्रसाद रुपेण ग्रहण अथवा ईश्वरके धरोहर बुझि उपयोग उचित रुपेॅं कएल जा सकैत अछि। एहि तरहेॅं कर्म व कर्मफलके ईश्वरक प्रति समर्पित कऽ क' प्रसाद रुपेण उपयोगके निष्काम कर्मयोग कहल जाइत छैक।
ज्ञान योग :- 
                ईश्वर सर्व शक्तिमान सर्वेसर्वा, सर्वव्यापी, जीवन- मृत्युक सार, श्रृष्टिकर्त्ता, पालनहार, प्रकृति के सभ तत्वके संचालन कर्त्ता, संहारकर्त्ता छथि। ओ सर्व कार्य, कारण व कर्त्ता भावसॅं विमुक्त छथि। फलस्वरूप कर्मबन्धनसॅं बाधित नहि छथि। तेॅं कर्म व कर्मफलके ईश्वरक प्रति समर्पित कएलासॅं मनुक्ख कर्मबन्धनसॅं मुक्त भ' जाइत अछि। अर्जुनके द्वारा युद्धभूमिमे कएल सभ क्रियाके अपना प्रति समर्पित करबाक कृष्ण अर्जुनकेॅं सभ कर्मक फलसॅं यानी अनेको हत्याक पाप बोधसॅं मुक्त करैत छथिन्ह। कर्मबन्धनसॅं मुक्त मनुक्ख के आत्मा परमात्मासॅं योग करबा लेल तैयार भ' जाइत छैक। कर्मबन्धनसॅं मुक्त व्यक्तिक लेल कोनो कार्य (कर्म) के पुण्य व पापक भागी नहि होमय पड़ैत छैक। कारण ओकर सभ कार्य ईश्वर द्वारा अनुशासित व प्रेरित होइत छैक, जेना अर्जुनक लेल अपना सम्बन्धी, गुरुजन, मित्रगणके धर्मयुद्धमे हत्या भेनाई ओकरा पापक भागी नहि बनबैत छैक। तेॅं ओ ईश्वरके सभ  कर्म समर्पित कऽ क' कर्मबन्धनसॅं मुक्त भ' क' जहन युद्ध लड़ैत छैक, तॅं ई युद्ध धर्म युद्ध भ' जाइत छैक। निष्काम कर्म करय वलाके जीवनमे, जीवन यापनमे, समाजमे या न्यायमे अथवा कोनो कार्यमे पापक भागी नहि होमए परैत छैक।
                       जन्म मृत्युके चक्रसॅं ओ मोहित नहि होइत अछि। दु:खी नहि होइत छैक, आ समत्व भावके प्राप्त करैत छैक।
" सम दु:खे सुखे कृत्वा,लाभा लाभौ जया जयौ"
" दु:खे ष्वनुद्विग्न मन: प्रकृति: सुखेषु विगत: स्पृह:
वीतराग भय: क्रोध: स्थित धीर्मुनि रुच्यते"
निष्काम कर्मसॅं मनुष्य स्थिर बुद्धि के प्राप्त करैत अछि। स्थिर बुद्धि भेलासॅं  कृपा, ज्ञानयोग, भक्ति योग के रास्ता खुजैत छैक। भक्ति योग द्वारा ईश्वरसॅं एकात्मकताक प्राप्ति होइत छैक, व मरणोपरांत आत्मा के परमात्मा संग विलय होइत छैक यानी मोक्षक प्राप्ति होइत छैक। ज्ञान योगके उपदेश भगवान सूर्य देवताके सर्वप्रथम देलखिन्ह। ई उपदेश जखन लुप्तप्राय भेलैक, धर्मक पतन होमय लगलैक, अधर्मके उत्थान होमय लगलैक त' महाभारतक युद्धके आरंभमे ओ समय आबि गेलैक जाहि के लेल भगवान कहलखिन्ह - 
" यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
 अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं शृज्याम्यहम्
 परित्राणाय साधूनाम विनाशाय दुष्कृताम
 धर्म संस्थापनार्थम सम्भवामि युगे युगे। "
ई ज्ञात कि भगवान सर्वेसर्वा छथि, सर्वशक्तिमान छथि, सभ जीवक स्वामी छथि, सृष्टिकर्ता, पालनहार, संहारकर्ता  एवं प्रकृतिके संचालक छथि व कर्त्ताभाव सॅं विमुक्त छथि। फलस्वरूप कर्मबन्धनसॅं बाधित नहि छथि।तेॅं कर्म व कर्मफलके ईश्वरक प्रति समर्पित (बलिदान)क' देला मात्रसॅं मनुक्ख कर्मबन्धनसॅं मुक्त भ' जाइत छैक। ईश्वर त' पहिनेसॅं कर्मबन्धनसॅं मुक्त छैक।
            जखन कखनो धर्मक पतन होइत छैक आ अधर्मक वृद्धि भ' जाइत छैक त' व्यक्तिगत रुपसॅं एहि पृथ्वी पर समय समय पर अवतार ल' क' भक्तगण के रक्षा तथा दुष्कर्मीके, दुराचारीके निराकरण करैत छथिन्ह। धर्मक पुनः स्थापना करैत छथिन्ह। जकरा ईश्वरके एहि लीला, ईश्वरक गुण व शक्तिक ज्ञान छैक,  ओ व्यक्ति कर्म बंधनसॅं मुक्त भ' जाइत छैक।एहन ज्ञान सॅं योगी पुनर्जन्म के कष्टसॅं बाॅंचि जाइत अछि।आ ओ मोक्षके योग्य भ' जाइत अछि। ईश्वरक तत्वकेॅं जानऽ बला, जन्म- मृत्युके चक्रसॅं बन्धन मुक्त भ' क' रहयबला कहल जाइत छैक।इएह असली ज्ञान छैक । एकरा प्राप्तिक मार्ग पर चल' बलाके ज्ञान योगी कहल जाइत छैक।
               भक्ति योग के साधना :-
चारि तरहक लोकके ईश्वरक पूजा करबाक सौभाग्य भेटैत छैक :-
 1.पिड़ित , दु:खी ,आर्त  विपत्तिमे फॅंसल व्यक्ति 
 2.ज्ञान के अन्वेषक या साधक(ज्ञान के खोज
   करयबला व्यक्ति)
 3.आनन्दक खोज करयबला व्यक्ति
 4.आत्मज्ञानी व्यक्ति
एहि चारु तरहक पुजारीमे  आत्मज्ञानी व्यक्ति सर्वोत्तम कहाइत छैक, कारण ओकर भक्तिक उद्देश्य स्वयं भगवान छथिन्ह। वएह पूर्ण पवित्र भक्त होइत छैक जकर पूर्ण चेतना ईश्वर पर समर्पित रहैत छैक। ओकरा कृष्ण प्रिय छथिन्ह आ ओ कृष्ण के प्रिय अछि। जॅं अहाॅं अपन बुद्धि के ईश्वरमे केन्द्रित नहि क' सकैत छी त' जप , कीर्तन द्वारा ईश्वरके स्मरण करु सेहो पार नहि लगैत अछि त' अपन सभ कर्मके ईश्वरके समर्पित करु जॅं सेहो पार नहि लागय त' कर्मफलके ईश्वरके प्रति समर्पित करू।
              भक्ति योगमे ईश्वरके प्रसन्न करबा लेल विशेष आडम्बरक काज नहि, ओ कहैत छथिन्ह - 
 "पत्रं, षुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
    तदहं भक्त्युप हृतमश्रामि प्रयतात्मन:।"
भक्तिक संग भगवानके मात्र फूल, पात, फल, जलसॅं प्रसन्न कएल जा सकैत अछि। भक्तिक उपस्थितिमे एहि मे सॅं कोनो वस्तु सॅं वा ओकरा अभावमे सेहो पूजा संभव छैक।
भक्ति भावक आवश्यकता पर जोर दैत भगवान कहैत छथिन्ह कि :-
        " मन्मना भव मदभक्तो, मद्याजी मां नमस्कुरु
          मामैवैश्यसि युक्त्वैव ममात्मानं मत्परायणम॥
यानी " सतत हमर बारेमे सोचू, हमर भक्त बनू, सतत हमर पूजा करु, हमर गुणगान करु। एहि तरहे हमरा शरणमे आबि कऽ अहाॅं हमरेमे बसि जायब।"
Always think of Me, be My devotee, always work to Me and pay obeisance to Me, Thus, taking refuse in Me, you will come to Me.I promise you this because you are dear to Me.
भक्तक रक्षाक लेल भगवान कहैत छथिन्ह -
       " अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना:पर्युपासते
        तेषां नित्याभियुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम्॥
I bear the responsibility of acquiring and protection of the necessities of my fully dependent devotee.
भक्तियोगमे लागल व्यक्तिके अपना आवश्यकता पूर्ति लेल निश्चिंत भ' जेबाक चाही कारण एकर पूर्ण भार भगवान अपना उपर ल' लैत छथिन्ह। समर्पित भक्तके सभ आवश्यकता पूर्ति भगवान करैत छथिन्ह।
भक्ति योगमे लागल मनुष्य के मरणोपरांत आत्माके परमात्मासॅं योग निश्चित छैक। अर्थात मुक्ति निश्चित छैक,  जन्म मृत्युक चक्रसॅं मुक्ति निश्चित छैक। सब तरहक दु:ख, भयसॅं निवारण भेनाई निश्चित छैक एवं संतोष व प्रसन्नताक प्राप्ति होइत छैक।
        एहि चारु तरहक भक्त पूजाक वास्ते इच्छुक गण के अलावे जिनकर मन भक्तिमे नहि लगैत छनि‌ तिनका लेल भगवान कृष्ण के उपदेश - 
If you are unable to firmly fix  your mind  in Me , try to attain Me by repeated praying of remembering Me. If you cannot do either, concentrate on offering all your actions to Me . You will attain perfection through actions performed for Me . And if you cannot then resolve to give up, for Me , the fruits  all your actions.
समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेषोस्ति न
ये भजन्तु तु मां भक्त्या, मयि ते तेषु चाप्यहम्।
मनुष्यक जीवनमे कर्मयोग, ज्ञान योग व भक्ति योगक महत्वक विषयमे भगवत गीतामे सत्य कहल छैक । वर्णित एहि तीनू योगक मानव जीवनमे उपयोगिता के ध्यानमे राखि क' कहल गेल छैक कि ई तीनू योग आलसीक लेल कर्मप्रेरक छैक, डरपोकक लेल साहसबर्द्धक, आ निराशक लेल आशावर्द्धक छैक, मृतप्राय के लेल जीवन दान छैक ।
                  -:इति :-
                                     राधा कान्त झा
                                     ग्राम + पोस्ट - चकौती
                                     थाना - नानपुर
                                     जिला - सीतामढ़ी
                                      पिन - 847307
                                     मो०-9958982363

Wednesday, February 15, 2023

Yog ke mahatva

 मनुक्खक जीवन मे yog ke उपयोगिताक के ध्यान मे रखैत कहल गेल छलैक कि आलसी क लेल  ई कर्मपेरक छैक, डरपोकक लेल  साहसवरधेक छैक , निराश क लेल ई आ आशावरधक छैक, मरणासनन क लेल नवजीवन छैक एवं सभ  कछेत्र मे सफल जीवन यापन कए लेल  मार्गदर्शक छैक। 



Sunday, December 15, 2019

Yoga of Selfless Action

Yoga of selfless Action
                   .    ( Nishkam Karm Yog)
Lord Krishna explains that no one can refrain from activity even for a moment. Inactive persons cannot maintain even their existence. One who externally restrains his hands, legs and other senses of action, is a fool. Know him to be hypocrite. He advises us to perform our prescribed duties, since to be active is better than idleness.
Superior is the person who has stabilized his senses by mind and engaged in the yoga of selfless action. Lord Krishna says that the Yoga of selfless action leads one to become my devotee, who is guaranteed all his necessities to be fulfilled by God.

Selfless duty performed as an Offering to the Supreme Lord is called Sacrifice or YAJNA. All action performed for any other purpose is the cause of bondage in the world of repeated births and death. 

Thursday, December 5, 2019

Bhagwad Gita in brief

Bhagwad Gita in brief.
         
It has been rightly said that Bhagavad Gita is activation for the lazy, courage for the fearful, hope for the hopeless and new life for the dying and a guide for leading a successful life in all fields. While the main purpose of Lord Krishna is to encourage and prepare Arjuna for his fight for the right against injustice, the  basic concepts of  life and death, body and soul, soul and supersoul,  knowledge, happiness and fulfillment, non attachment and peace, selfless action, fruitless action, avoidance of ego and anger, controlling senses and getting rid of delusion(Maya), wisdom and qualities of wise persons, renunciation and sacrifice, meditation and realization, God, His omnipresence and His power of dominance and excellence over everything animate and inanimate, creation, sustenance, destruction, Time and Death as God, merciful and miraculous uplifting of all, devotion and God's loving kindness of assuring fulfillment of devotees' all needs, faith and human nature, liberation from results of action,  cycle of birth, illness, old age and death have all been explained in His one to one conversation with Arjuna.  It is a must read by every one, irrespective of his faith, religion and belief.

Tuesday, November 12, 2019

Yada  yada hi dharmasy glaanirbhavati Bhaarat
Abhyutthaanam dharmasya tadatmaanam srijamyaham.
Paritraanay sadhoonaam vinashay cha dushkritam
Dharm samsthaapnaarthaay sambhawaami yuge yuge .

Monday, September 21, 2015

Sunday, April 5, 2015

स्वर्गीया दुर्गा दाई (सहोरबा वाली ) क प्रथम पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि


चकौती पंडित टोल क़े स्वर्गीया दुर्गा दाई (सहोरबा वाली ) क  प्रथम पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि 

Bihari with his load of Marhanna


Sunday, August 31, 2014

विदेश, विदेश नीति तथा ओकर व्यक्तिगत एवं सामूहिक आवश्यकता

          चकौतीवासी  हमरा लोकनि अपना अपना स्थिति सँS   बहूत  आसक्त  छी।  जाहि सँS किछु नब दिशा में अग्रसर होबक लेल  यथास्थिति में मूलभूत परिवर्तन होबक जे खतरा क भय अनुभव होइत छैक, ओ नब दिशा  में बढय   क लेल बाधक साबित भS सकैत अछि।  एहि बाधा के निराकरण  करबा के  हमरो अनुभव भेल।  गामक किसानक परिवार में पोसायल व्यक्ति के लेल चकौती क चौर चांचर सँS आगू बढ़िकS  चेकोस्लोवाकिया क राजनयिक गतिविधिक विश्लेषण करबा क लेल  अवश्य एहि आसक्ति क त्याग करय परल। 

         एहि तरहें अनासक्त होइतो मोह्त्याग अत्यंत कठीन छैक।  तैं मैथिली भाषा में एही ब्लॉगके माध्यम संS हम विदेश सँ   भारत वर्ष के लगाव के अपन व्यक्तिगत अनुभव व्यक्त करय चाहैत छी जाहिसँ चकौती गामवासी  तथा अन्य मिथिलावासी में विदेश, विदेश नीति तथा ओकर व्यक्तिगत एवं सामूहिक आवश्यकता   सं  विशेष रूचि जगैन्ह। जाहि सँ दुनू हाथे लड्डू  खाइत रही। 

                    पुरना जमाना में हमरा लोकनि के परिचय अंग्रेज,  पश्चिमी एशियन  व यूनानी सं भेल जे भारत सS आर्थिक सम्पदा अरजय लेल अयलाह आ युद्ध करैत साम्राज्य स्थापित कैलन्हि। परन्तु अजुका जुग में तS सूचना एवं   संचार तकनिकी क आगमन व परिणामस्वरूप सामाजिक मीडिया विस्फोट क संगे दुनिया क सब देश के हरेक बात मनुक्ख क मुट्ठी में सिमटि  गेलैक अछि।   वसुधैव कुटुम्बकम  के अर्थ में  हमरा लोकनि ग्लोबली अन्योन्याश्रय भय चुकल छी। आब बाउ  बढ़ल  कुटमैती क अतिरिक्त जिम्मेदारी तS  निमाहबे परत। आ कुटुमैती नीक  त  लिय ने, " मीन पीन पाठींन पुराना, भरि भरि भार कहारन आना " अरब, ईरान, एमिरात, मध्य एशिया, वेनेज़ुएला व् अफ्रीका  स आवश्यक ऊर्जा लिय,  अफ्रीका स सोना, ताम्बा, हीरा,मोती व् जवाहरात लीय, अमरीका, जापान, इजराइल, दक्षिण अफ्रीका स अस्त्र शस्त्र लिय।  चीन, पाकिस्तान सॅ  शांति लिय।  दुनिया के अन्य भाग स सेहो किछु नीके भेटत। आ कोन देश एहन छै  जतह सॅ आवागमन, व्यापार, संचार, निवेश, विद्या, तकनिकी व विचार विनिमय एवं आपसी सहयोग कैलाक फैदा नहि छैक ?  जौं पडोसी सं कुटुमैती में कटुतो अछि  तैयो पड़ोसी बदलल त नहि जायत, जेना तेना निमाह परत।  आ बौआ विदेश जा क कमाइत छथि त लिय ने पौ बारह।  

अगिला ब्लॉग में खरिआरि  क  विषय के अन्य पहलू पर चर्चा करब। ताबत एहि चर्चा के आगू बढ़ाबक हेतु  विश्व मामला क भारतीय परिषद के वेबसाइट ( http://www.icwa.in/ ) देखू। 

Tuesday, July 29, 2014

Mamev sharanam. braja

Sarvaa dharma parityajjya mamev sharanaam braja

The best way to lead a successful life is to follow Lord Krishna's advice.
By surrendering fruits of all our actions to Lord means surrendering all responsibility of the doer to the Lord. There after whatever a person does or omits to do is always at the directions of the almighty. The process thus goes in the  right direction and the result is always right and the desired one. I can vouch having experimemented this successfully
.

Saturday, July 26, 2014

Dream to internationalise Chakauti

I had initially thought  that I should spend my time peacefully in Chakauti  enjoying clean air and close connection with near and dear ones and working as farmer, like Garibaldi did in early 20th century Italy. My dreams were shattered by the tremendous changes in the farming  scenario which has become non viable and uneconomical  in Chakauti.

My four decade long assosciaton with matters of India's interests in foreign countries and international issues brought me to  Indian Council of World Affairs, an institution of national importance and a think tank on foreign policy and international issues which  conducts research and offers policy options through its publications, conferences, seminars, lectures and large number of other programmes, which can be accessed through its website: www.icwa.in.  After my retirement from Indian Foreign Service, I joined the Council as a Consultant.

However, I do keep contemplating my plans to return to the serene breezes in the   meadows of Banrahi and Darima and to the mango grooves of Paktola Gachhi.

At the same time, I consider it an opportunity for me to promote among the villagers an awareness towards international issues as well as  our need for connecting to the world at large.  The connection has grown multy fold in the twenty first Century  with the expanding contours of  communication revolution and availability of media resources to the masses.

A village in the shadow of  darkness of the past century, still bereft of electricity and internet has to come up with the modern facilities to connect to the world  to the point which could allow it to attract its own people, before we can hope too invite a foreigner. Those interested to internationalize Chakauti may visit the website of Indian Council of World Affairs ( http://www.icwa.in/ )   

Saturday, May 18, 2013

Viyogi Story

My friend of college years, Yogendra Pathak “ Viyogi”, met me during his visit to Delhi in March 2013 after a gap of a quarter century. After parting our ways on completion of our university education in late sixties there was little chance for us to exchange our views as he had plunged deep into the research and academic pursuit of cyclotrone in Atomic Science leaving me far behind in Government’s bureaucratic humdrum.  During his visit to CERN to explore the particles moving faster than light found time to remember and see me in Geneva 25 years ago and enjoy chura-dahi in my apartment.


I was extremely curious and excited when he called me from Kolkata to inform that he would visit Delhi on his Mission to inculcate awareness and deeper interest among school children at Bal Bhavan in science education. Now when I feel long left by my fast moving friends and acquaintances, the news was like a nectar in the mouth of a dying dove.

After exchanging word of personal intimacies and how we felt about being so far away in distance and ideas, it was he who talked in terms of connecting our villages by raising interests of school children towards modern sciences. Realizing that Mithila being too sticky about to the language and culture, it has to come in tune with the tremendous revolution in science and technology and knowledge around the world. He suggested that I learn Shusha font from Google and write in Maithily in blogs about my experiences during my work and travel abroad during the past four decades.



I have always been attached emotionally to my village “Chakauti”. Having been several times reminded of our legacies of wisdom in pursuance of excellence in education of pre independence era in faculties such as, Jyotish, Nyaya, Vyakaran and Ayurved and having five Mahamohopadyas at the same time in the family running an ashram like education system when pundits and princes from near and far away came to learn the wisdom sitting on the floors of huts and shadow of mango grooves at Pandit Tola.  I am equally aware of the current darkness in homes and muddy streets, streets and pathways stinking with defecation, drinks and drug abuses, women being treated with cruelty to the extent of bride burning. Awareness towards family and social responsibilities, positive direction to children in the muddles of advertisements and raising hopes for better future among people and dispersing the fears of despair can only salvage us from the scourge of evils we have been facing for the past 66 years of freedom.

Monday, February 20, 2012

Aum Namah Sheetaleshwaray Namah : ॐ नमः शीतलेश्वराय नमः



ॐ शीतलेश्वराय नमः 











 ॐ शाम्बशिवाय नमः  




















































जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले


गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्


डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं


चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् .. १..




जटा-कटा-हसं-भ्रम भ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी-


-विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि .


धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके


किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. २..






धरा-धरेन्द्र-नंदिनी विलास-बन्धु-बन्धुर


स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे .


कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि


क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि .. ३..




जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्फणा-मणि प्रभा


कदम्ब-कुङ्कुम-द्रव प्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे


मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे


मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि .. ४..




सहस्र लोचन प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर


प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठभूः


भुजङ्गराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:


श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥ ५..




ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा-


निपीत-पञ्च-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्


सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं




कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल

द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके


धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक


-प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने m 
 तिर्मम … ७॥


नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्


कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः


निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः


कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥ ८..


प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा-


-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् .


स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं


गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे .. ९..


अखर्व सर्व-मङ्ग-लाकला-कदंबमञ्जरी


रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम् .


स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं


गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे .. १०..




जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजङ्ग-मश्वस-


द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्


धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल


ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः .. ११..




दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्


-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः .


तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः


समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. १२..




कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुञ्ज-कोटरे वसन्


विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .


विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः


शिवेति मंत्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. १३..




इदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं


पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् .


हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं


विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. १४..




पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः


शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे .


तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां


लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. १५..

Thursday, February 16, 2012

चकौती शौचालय से वंचित : खुले में शौच : स्वच्छता अभियान कार्यशाला आयोजित



बोखड़ा (सीतामढ़ी),:संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत चकौती महादलित
मोहल्ला स्थित मध्य विद्यालय चकौती के प्रांगण में एक कार्यशाला का
आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रखंड बीस सूत्री उपाध्यक्ष भवनाथ मिश्र ने की।
 
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांसद अर्जुन राय ने कहा कि पूरे बिहार
में मुख्यमंत्री को अगुआई में एक भी जगह शौचालय से वंचित नहीं रहेगा। 
इसके लिए सरकार सहयोग के साथ ऋण भी मुहैया करा रही है। ताकि 
संपूर्ण स्वच्छता अभियान सफल हो। उन्होंने ने यजुआर-सुरसंड, सड़क
को एनएच में देने की जानकारी देते हुए कहा कि इसकी स्वीकृति भी
मिल चुकी है। सांसद श्री राय ने आम जनता के विद्युतीकरण करवाने
के सवाल पर कहा कि बिहार उर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भर नहीं है। 
इसके बावजूद अगले दो वर्षो में बिजली का कार्य पूरा कर लिया
जाएगा।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक डा. रंजू गीता ने कहा 
कि संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत गरीबों को शत प्रतिशत 
शौचालय का निर्माण कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि खुले में 
शौच करने से वायरस बढ़ता है और बीमारी फैलती है। कार्यक्रम 
का संचालन नसीर अहमद ने किया। जबकि कार्यक्रम को 
पीएचडी के कार्यपालक अभियंता सुंदेश्वर प्रसाद यादव, 
अभियंता सीताराम यादव, अशोक चौधरी, कृष्ण कुमार सिंह 
'पप्पू' बदरे आलम, राम प्रमोद सहनी, संतोष ठाकुर, मो. परवेज,